ओम नमः शिवाय। ओम जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा स्वाहा स्वदा नमोस्तुते। या देवी सर्वभूतेशु — नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां काली की कृपा आप सभी पर बनी रहे। आप सभी एक सशक्त शरीर, स्थिर मन और बुद्धि के स्वामी बनें।
Kabeer Ji Maharaj कहते हैं: "आज की चर्चा बहुत Important है। यह Significant है — जीवन के लगभग समस्त आयामों को स्वरूप देने के लिए। आपके स्वभाव को, आपके धर्म को नियति देने के लिए।"
भाग 1 — दृश्य इंद्रिय गुण है: पूरे जीवन की धारा यहीं से तय होती है
Kabeer Ji Maharaj एक profound सूत्र से शुरू करते हैं: "दृश्य इंद्रिय गुण है।"
हमारी इंद्रिय शक्ति हमेशा हमें बाह्य स्वरूप का वर्णन कराती है। इंद्रियाँ इतनी बलशाली हैं कि आपके पूरे अस्तित्व को खींच के ले चली जाती हैं।
जो सामने आता है — वह दृश्य बनता है। वस्तु, व्यक्ति, घटना, विचार।
दृश्यों का स्वभाव है बदलना। वे स्थायी नहीं हैं — लेकिन हम उन्हें स्थायी मान लेते हैं।
जो बार-बार देखते हैं — वह चेतना का हिस्सा बन जाता है।
चेतना में बसा दृश्य विचार का रूप ले लेता है।
और जब विचार भावना से मिलता है — तो जीवन की ऊर्जा का प्रवाह या तो अवरुद्ध हो जाता है या उर्धगामी हो जाता है। यही दो रास्ते हैं।
लिखी रखी है पट कथा — मनुष्य पात्र है।"
Kabeer Ji Maharaj कहते हैं: "मनुष्य ने लिखा है तो मनुष्य को संबोधित किया है। अन्यथा यह पूरे प्राणी जगत के लिए, पूरे वनस्पति जगत के लिए — जलचर, थलचर, पिंडज, श्वेतज, मलज, अंडज — जो भी जितनी प्रजातियाँ हैं, सभी के लिए समान रूप से लागू होता है।"
दृश्यों का बनना, दृश्यों की आवृत्ति — हमारे जीवन धारा को नियंत्रित करती है। यह सत्य है।
भाग 2 — स्वतंत्र और परतंत्र दृश्य: कर्म और प्रारब्ध का रहस्य
Kabeer Ji Maharaj एक महत्वपूर्ण विभाजन करते हैं — दृश्य का स्वतंत्र होना और परतंत्र होना।
कर्म नहीं बनते। कर्म कटते हैं। प्रारब्ध कमजोर होता है। आप अपनी नियति के नियंता बनना शुरू हो जाते हैं।
कर्म बनते हैं। प्रारब्ध प्रभावी होता है। जीवन नियंत्रित होता है। आप कमजोर, असहाय और बंधा हुआ महसूस करते हैं।
"दृश्यों के बनने-बिगड़ने का आधार जब स्वतंत्र न होके परतंत्र हो जाता है — तब खेल बिगड़ जाता है। पूरा काम खराब हो जाता है।"
और परतंत्र और स्वतंत्र होने में जो आधारभूत स्थिति है — वो है Competition और Comparison। प्रतियोगिता और तुलना — यही वह हथियार है जो बुद्धि Consistently 24×7 चलाती रहती है।
भाग 3 — तुलना और प्रतियोगिता: आभामंडल का खंडन और सेतु का निर्माण
Kabeer Ji Maharaj यहाँ Depression की जड़ को खोलते हैं। आज की तुलना कहाँ-कहाँ होती है?
"इतने ज्यादा हम संवेदनशील हो गए हैं दूसरे के प्रति, दूसरों के दायरे में जाने के लिए — कि हम फिर वहाँ से निकल नहीं पाते।"
यह संवेदनशीलता ने fundamentally जो बदला है — आपके खुद के आभामंडल में कई सारे छेद कर दिए।
"जैसे ही आप दूसरे से तुलना, दूसरे से प्रतियोगिता करना शुरू करते हो — आपका आभामंडल खंडित हो जाता है। आपके और दूसरे के आभामंडल में एक सेतु बन जाता है। एक Bridge बन जाता है।"
— Kabeer Ji Maharaj · Daily Discourseउस सेतु के माध्यम से: उस वस्तु का, उस चित्र का, उस Reel का, उस व्यक्ति का — उसका आभामंडल आपके अंदर खेलना शुरू करता है। उसकी शक्ति बढ़ती है। आपकी शक्ति क्षीण हो जाती है।
Kabeer Ji Maharaj कहते हैं: "प्रकृति ने व्यवस्थाएं ऐसे ही थोड़ी बनाई हैं। प्रकृति ने आपको स्थिर रखने के लिए एक गुण दिया है। एक धर्म दिया है। एक आभा दी है। एक ओज दिया है।"
उस आभा से, उस ओज से जब हम छूटते हैं — Leakages होना शुरू होते हैं। ऐसे सेतु बनने शुरू होते हैं। और एक-दो सेतु नहीं — अनेकों सेतु बनते हैं। हजारों दिशाओं से आप अपनी ऊर्जा का, अपनी भावनाओं का, अपने विचारों का क्षय करते रहते हैं। फिर जीवन आपके नियंत्रण से बहुत दूर निकल जाता है।
यही तुलना, यही प्रतियोगिता — आपकी कल्पनाओं को भ्रम का रूप दे देती है। हमारी चिंता, बेचैनी, स्वभाव कल्पनाओं से स्पंदित हो जाता है। जब कल्पनाएं भ्रामक होती हैं — असुरक्षा का भाव आता है, डर जागृत होता है, द्वेष जागृत होता है, ईर्ष्या जागृत होती है।
Kabeer Ji Maharaj — मंदिर के घंटों के नीचे। "शरीर माध्यम खल धर्म साधना" — धर्म को साधने के लिए शरीर को माध्यम बनाओ। | Daily Discourse
भाग 4 — काश और अगर: Past और Future के दो जाल
Kabeer Ji Maharaj बताते हैं — तुलना और प्रतियोगिता आपके जीवन में दो धाराओं को Trigger करती हैं:
"काश हमने ऐसा किया होता तो ऐसा होता।" गिल्ट रह जाते — निर्णयों के, रिश्तों के, समय के। अपराध बोध आपका आधार बनते हैं।
"अगर अब हम ऐसा करेंगे तो ऐसा हो जाएगा।" काल्पनिक भविष्य की Anxiety। जो हुआ ही नहीं — उसका डर।
Source क्या बनता है? — Competition और Comparison। यही आधार बनता है। फिर आप फैलते हैं। अनेकों अनेक दिशाओं में विचार स्पंदित होते हैं। सारे रुगण विचार, सारी भ्रामक दिशाएं — जिनका कोई आधार नहीं, कोई अस्तित्व नहीं।
Kabeer Ji Maharaj एक और गहरी बात कहते हैं: "आपको लगता है कि आप किसी Incident को बार-बार याद करके, उसकी छवियाँ, उसके दृश्य अपने जीवन में समाहित करके — बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।"
गिल्ट से भरना बहुत अच्छा काम है।
शंका से भरना बहुत अच्छा काम है।
"आपको लगता है कि इससे थोड़ा सा रुगण भाव से आप एक अच्छे व्यक्ति बन जाएंगे। आधार बन जाएगा कि आप अच्छे हैं — इसलिए ऐसा सोच रहे हैं।"
यह Trap है। यह Depression का entry point है।
भाग 5 — जीवन क्रम है: Time Travel नहीं होता — विरासत को Foundation बनाओ
Kabeer Ji Maharaj यहाँ एक बेहद practical और liberating truth देते हैं:
"जीवन क्रम है। इसके किसी भी चरण में — कभी भी — आप वही कर सकते हैं जो उस समय आपकी समझ थी, आपकी मनोस्थिति थी, भावनात्मक स्थिति थी।"
आप उस समय पर वह नहीं कर पाए — जैसा आपको आज लगता है। तो फिर आज कर सकते हैं ना? आप Time Travel नहीं कर सकते। समय निकल जाता है।
आप जिस विरासत के ऊपर विराजमान हैं — उसे आगे बढ़ाना है, Expand करना है। उसकी कहानियों और किस्सों के साथ नहीं जीना है।
वो अच्छी यादें हैं। बुरी यादें हैं। वो केवल यादें हैं। इसीलिए उन्हें "भूत" कहते हैं — अब वो Exist नहीं करतीं।
"हमारी कल्पनाएं, हमारी Memory हमको जिंदा रखती हैं। छोड़ा जा सकता है। तत्काल छोड़ा जा सकता है। लेकिन तत्काल छोड़े जाने के लिए — आपने जो Pattern बना लिया है, उस Pattern को भी तत्काल तोड़ना पड़ेगा।"
जीवन का एक क्रम है, नियम है। लगातार जिस दिशा में काम किया जाता है — वह काम एक Mechanical Outfit बना लेता है। फिर वो अपने आप होना शुरू हो जाता है। जब वो अपने आप होने लगे — उस ढाँचे को तोड़ा नहीं जा सकता, खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन उससे बेहतर ढाँचे से Replace किया जा सकता है।
भाग 6 — जागरूकता और शिक्षा: सभ्यता ने क्यों बनाई शिक्षा प्रणाली?
Kabeer Ji Maharaj यहाँ एक बड़े context में जाते हैं — Replace करने की सबसे बड़ी प्रक्रिया है: जागरूकता — Awareness।
जो पहले की सभ्यताएं हैं — जो संघर्षों से, कठिनाइयों से निकल के आईं — उन्होंने विकास किया। शिक्षा के क्रम को स्थापित किया। ताकि आप उन्हीं संघर्षों को Relive न करें। उस समझ से आगे Develop हो सकें।
"शिक्षा चरण-चरण ही होती है। ये शिक्षा आपको धीरे-धीरे उर्धगामी करेगी।"
लेकिन शिक्षा का पतन होता है। जागरूकता का पतन होता है। चेतना स्थिर होती है। धारा बिगड़ती है। उर्धगामी से अधोगामी ऊर्जा हो जाती है — तो जीवन की धारा बिगड़ जाती है।
"चुनाव तो आपने ही किया।" — यह सुनना कठिन लगता है। लेकिन यही सत्य है। और यही सबसे बड़ी freedom भी है।
भाग 7 — अपराध बोध का बीज: अंश मात्र भी मत छोड़ो
Kabeer Ji Maharaj अब सबसे critical point पर आते हैं। वे कहते हैं — अपराधों से अपने आप को मुक्त करना पड़ेगा।
"जो भी किया हो, कुछ भी किया हो — जो भी आपको लगता है कि आपने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। आप उसके लिए खुद को दोषी मानते हो। या आपको लगता है कि आप कुछ बेहतर कर सकते थे — आपको उसका अपराध बोध है। या कुछ भी जो आपको सताता है, चिंतन का कारण बनता है।"
अगर अंश मात्र भी बचा के रखा — वह वापस से जागृत होगा।
क्योंकि वही अंश मात्र बीज बन जाएगा।
वह बीज फिर से एक महान और विशाल बरगद का पेड़ बन जाएगा।
फिर उस पेड़ को काटना बहुत मुश्किल होगा।
"यही किया है आपने अभी तक।"
जब जो विचार होते हैं — वो विचार फैल के आपको चारों तरफ से घेर लेते हैं।
एक विचार आता है जिसका अस्तित्व नहीं होता। कहाँ से आता है? कोई बात सुनी, किसी को देखा, कोई खुशबू आई, कोई याददाश्त। वह विचार धीरे-धीरे Juicy होना शुरू हो जाता है — जब आपकी भावनाएं उससे मिलती हैं।
भाग 8 — विचार भावना से हकीकत बनता है: वह Mechanism जो Depression बनाती है
Kabeer Ji Maharaj यहाँ Depression का पूरा mechanism step-by-step explain करते हैं:
एक Sound, एक दृश्य, एक खुशबू, एक Memory — और वह विचार प्रकट होता है। "विचार का कोई अस्तित्व नहीं होता।"
आप अपनी भावनाओं को उस विचार से जोड़ते हैं। तभी वह विचार धीरे-धीरे Juicy होना शुरू होता है। भावनाएं उसे आयाम देने लगती हैं।
वह आपके पूरे शरीर में, चेतना में प्रभावित होने लगता है। "आप उसे महसूस करते हैं — जिसका अस्तित्व नहीं है।"
उस काल्पनिक असुरक्षा को आप अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं। आप डर से कंपित होते हैं। शंका आपके अस्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
आप देख नहीं पाते कि आगे क्या सही है, क्या गलत है। इसलिए वो अंश मात्र जो लेश मात्र भी अपराध बोध का विचार रह गया है — उसे छोड़ना पड़ेगा।
"आप एक महान यात्रा के लिए जन्मे हो। वो अपराध नहीं थे — वो यात्रा के चरण थे। आपसे वो गलती होनी थी — इसलिए हुई। आपको जागरूक होना था — इसलिए आज आप इस समझ के साथ बैठे हो।"
— Kabeer Ji Maharaj · Daily Discourse"उससे आगे की यात्रा आपको तय करनी पड़ेगी। छोड़ना पड़ेगा। इस कल्पनाओं के सागर से आपको अपने आप को एक वास्तविक स्वरूप देना पड़ेगा।"
सबसे पहला चरण है — जागरूकता।
भाग 9 — यह नरक है: Depression का शरीर पर पूरा Physical Cascade
Kabeer Ji Maharaj अब स्पष्ट रूप से कहते हैं:
यह आपको नारकीय अवस्था में ले जाता है।
असहाय बनाता है। रुगण बनाता है।"
और यह केवल मन को नहीं — शरीर को भी रुगण करता है। पूरा तंत्र बिगड़ जाता है। शरीर की Tendency बदल जाती है। घाव बनने शुरू हो जाते हैं।
Step 2 — फिर शरीर के सारे तंत्र बिगड़ते हैं।
Step 3 — बेचैनी बढ़ती है।
Step 4 — Respiratory System बाधित होना शुरू।
Step 5 — Lungs में दिक्कत होनी शुरू।
Step 6 — रक्त में संक्रमण होना शुरू।
Step 7 — खाना नहीं पचता। जठराग्नि दूषित हो जाती है।
Step 8 — पूरे शरीर में रक्त का प्रवाह, Oxygen का प्रवाह बाधित।
Step 9 — हर Joint बाधित। Oxygen कोशिका-कोशिका तक नहीं पहुँचती।
Step 10 — शरीर निर्जीव और कमजोर महसूस करता है।
"आमंत्रण किसका? — आपका। आप स्वागत कर रहे हो उन विचारों का, भावनाओं के साथ, ऊर्जा के साथ।"
Pattern तोड़ना पड़ेगा। और उस Pattern को तोड़ने के लिए — "श्वास और शरीर सबसे बड़ा माध्यम बनेंगे आपका।"
Kabeer Ji Maharaj कहते हैं: "आप जान चुके हो कि आप इसमें जकड़ चुके हो। अगर इतना आपको पता है कि आप वो महसूस नहीं कर रहे हो जो आप सच में हो — तो आप इस जाल में फंसे हुए हो। इस नारकीय पूरे के पूरे कोण में आप स्थापित हो चुके हो। अब आपको निकलना है।"
Kabeer Ji Maharaj — मंदिर दर्शन, पूजा थाल के साथ। "शरीर माध्यम है इस धर्म में जीवंत होने का।" | Daily Discourse · Rajdharma 3.0
भाग 10 — शरीर माध्यम खल धर्म साधना: निकलने का पूरा Roadmap
Kabeer Ji Maharaj कहते हैं: "निकलने की विधाएं Sanatan संस्कृति में अनेकों अनेक हैं। अनेकों Yoga, Pranayama, बहुत विस्तार है।"
लेकिन मूल रूप से — सबसे पहले शरीर की अवस्था को नियंत्रण में लाना पड़ेगा।
शरीर को माध्यम बनाओ — धर्म को साधने में।"
Kabeer Ji Maharaj समझाते हैं: "धर्म का मतलब — संपूर्ण प्रकृति। धर्म का मतलब — पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, इंसान, भावनाएं, विचार — यह सब कुछ धर्म के अधीन है। शरीर माध्यम है इस धर्म में जीवंत होने का, स्पंदित होने का, विचरण करने का, खेल करने का, लीला करने का।"
"अगर शरीर को हमने माध्यम नहीं बनाया — तो हमारे पास और कोई माध्यम है ही नहीं इस अस्तित्व में जीने के लिए। इस अस्तित्व का आनंद लेने के लिए, आनंद पूर्ण होने के लिए, उपभोग करने के लिए पूरी वसुंधरा का।"
Step A — शरीर का आधार: क्या खाते हैं?
Spicy खाना, तेल, मिर्ची — अगर इनका ज्यादा सेवन करते हैं तो: चीजें बिगड़ती हैं, विचार बिगड़ते हैं, रुगणता आती है, Anxiety बढ़ती है, BP बढ़ता-घटता है।
क्या कंज्यूम कर रहे हैं? कितना कंज्यूम कर रहे हैं? यह अनुपात आपको decide करना पड़ेगा।
सुपाच्य भोजन। अल्प मात्रा में। समय-समय पर।
Step B — उपवास: शरीर को Recovery का समय दो
लेकिन जब उसे हम समय नहीं देते — लगातार कुछ न कुछ भरते रहते हैं — वह Dustbin हो जाता है। और इसीलिए हमारे विचार भी Dustbin हो जाते हैं। फिर Dustbin में सड़न पैदा होती है।
Step C — शरीर को Move करो
Depression के Patterns शरीर के हर एक जोड़ को, हर Joint को बाधित कर देते हैं। रक्त का प्रवाह, Oxygen का प्रवाह बाधित। जब रक्त शुद्ध नहीं होता — विकृतियाँ बढ़ती हैं। जब Oxygen कोशिका तक नहीं पहुँचती — शरीर निर्जीव। शारीरिक रूप से सक्रिय होना शुरू करो।
भाग 11 — शरीर = मंदिर, Dustbin नहीं: सुगंधित, हल्का, व्यवस्थित रखो
"शरीर है आपका मंदिर। इस मंदिर को आपको सुगंधित रखना है। हल्का रखना है। व्यवस्थित रखना है।"
— Kabeer Ji Maharaj · Daily DiscourseKabeer Ji Maharaj एक vivid comparison देते हैं: "Dustbin में सड़न पैदा होनी शुरू हो जाती है। वो सड़न ऐसी महक बनती है कि पूरा का पूरा शरीर महकने लगता है। बदबू आने लगती है, दुर्गंध आने लगती है।"
इसके विपरीत — जब शरीर-मंदिर व्यवस्थित होगा:
इसमें बसे हुए प्राण जागृत होंगे। ऊर्जा को दिशाएं मिलने लगेंगी।
समझ में आएगा कि मन पर नियंत्रण किया जा सकता है।
जितनी भी चित्त की वृत्तियाँ हैं — वो स्पष्ट दिखने लगती हैं।
Memory, Imaginations आती हैं। आपको दिखती हैं। आप उन्हें Handle कर पाते हो।
"Handle करने के लिए जो Instrument है — वो बाहर से नहीं आएंगे। वो आपको स्वस्थापित करने पड़ेंगे।"
भाग 12 — Depression = D + Press: शब्द में ही उत्तर छुपा है
Kabeer Ji Maharaj एक powerful etymology देते हैं:
Negatively Downward। नीचे की तरफ। अधोगामी।
दबा हुआ। आप अपने प्राण को, मन को, ऊर्जा को, धारा को दबा रहे हैं।
"दबाएंगे तो वह रुगण हो जाएगा, सड़ जाएगा। कोने में चला जाएगा, Darkness में चला जाएगा।"
इसके विपरीत आपको चाहिए: प्रकाश में आना, ऊर्जावान होना, विस्तार।
स्वीकार करो: जो आप हैं, जैसे आप हैं, जो भी आपने किया है — क्षमा करके आज स्थापित हो जाओ।
"जब समझ नहीं थी — कोई बात नहीं। अगर आज हम समझ सकते हैं, आज जागरूक हो सकते हैं — तो आज से हमारा पुनर्जन्म होना चाहिए।"
भाग 13 — अहम् ब्रह्मास्मि: किसी भी क्षण — आज से — पुनर्जन्म करो
Kabeer Ji Maharaj इस पूरे discourse को Upanishad के सबसे बड़े वाक्य से जोड़ते हैं:
जैसे ब्रह्मा पूरी सृष्टि को Create किए हैं —
आप अपने जीवन को भी Recreate कर सकते हैं।"
यही पुनर्जन्म का सिद्धांत है। Kabeer Ji Maharaj कहते हैं:
किसी भी क्षण, किसी भी अवस्था में। यह नियंत्रण आपके हाथ में है।
जीवन के आयामों को, दिशाओं को, रिश्तों को, भावनाओं को, विचारों को — सब नया।
एक-एक कोशिका को नया करो। "अपना पुनर्जन्म आज से कर सकते हैं।"
अपने Resonance को नया करो। नई Frequency पर जीना शुरू करो।
"आप अपने हिसाब से कर सकते हैं। अभी भी आपके हिसाब से ही हो रहा है — लेकिन वह अचैतन्य है।"
"चैतन्य करेंगे — तो आनंद पूर्ण करेंगे। प्रेम पूर्ण करेंगे। उत्साह पूर्ण करेंगे। सूत्र वाक्य सुनने के लिए नहीं — आचरण में लाने के लिए। अपने जीवन का एक-एक चरण धर्म आधारित कर देंगे — बदल जाएगी नियत। मज़ा आ जाएगा।"
— Kabeer Ji Maharaj · Daily Discourse · Closing Wordsऔर अंत में Kabeer Ji Maharaj की प्रार्थना: "मां जगदंबा, मां काली — आपके जीवन में प्रेरणा, सद्भाव, ऊर्जा, व्यवस्था स्थापित करें। आपका — भावनाओं पर, मन पर नियंत्रण — जिसे अनुशासन बोलते हैं — वो स्थापित करें। ऐसी कामना है, ऐसी भावना है। राधे राधे।"
इस Discourse के 9 Deepest सवाल-जवाब
Depression से बड़ा नरक कुछ नहीं।
D + Press = दबा हुआ।
तुलना-प्रतियोगिता छोड़ो — आभामंडल को पूर्ण करो।
काश-अगर के जाल से निकलो — विरासत को Foundation बनाओ।
अपराध बोध पूरी तरह छोड़ो — अंश मात्र भी बरगद का बीज बनेगा।
शरीर को मंदिर मानो — Dustbin नहीं।
सुपाच्य भोजन। उपवास। Movement। Yoga। Pranayama।
चित्त की वृत्तियाँ दिखने लगेंगी — Handle होने लगेंगी।
अहम् ब्रह्मास्मि।
किसी भी क्षण — आज से — अभी से — पुनर्जन्म।
मां जगदंबा, मां काली — प्रेरणा, सद्भाव, ऊर्जा और अनुशासन स्थापित करें 🙏
राधे राधे · Kabeer Ji Maharaj · Daily Discourse · Rajdharma 3.0